Human Story: जो बच्‍चा अब तक प्रेम की निशानी था, वो अचानक नाजायज कैसे हो गया?

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BYManisha PandeyManisha Pandey | News18Hindi Updated: October 12, 2018, 3:23 PM IST
26 जुलाई का दिन था, साल 2005. मैं गोरेगांव में अपने घर पर थी. फ्लैट दूसरी मंजिल पर था. पिछले 24 घंटों से मुंबई में हाहाकारी बारिश हो रही थी. लग रहा था मानो आसमान से सैलाब उमड़ आया हो और पूरे शहर को अपने साथ बहा ले जाएगा. मैं घर पर अकेली थी. पेट में नौ महीने की बच्‍चा था. वो किसी भी वक्‍त दुनिया में आ सकता था. बच्‍चे का बाप नहीं था क्‍योंकि मैं ही बच्‍चे की मां भी थी और उसका बाप भी. घर में पानी भर रहा था. मैंने बेड की प्‍लाई निकालकर बालकनी के पास रख ली. सोचा अगर पूरे घर में पानी भर गया तो मैं इस प्‍लाई पर बैठकर जितनी दूर तैरकर जा सकती हूं जाऊंगी. लेकिन शुक्र है कि ऐसी नौबत नहीं आई. पानी सिर से ऊपर होने से पहले बैठ गया, लेकिन उस पूरे दौरान जिस तरह एक-एक क्षण मेरा दिल बैठा जा रहा था, मैं ही जानती हूं. मैं और मेरा बच्‍चा संकट में थे. हमने उस संकट को अकेले झेला, एक-दूसरे के साथ. उस दिन आधे पांव पानी में डूबे हुए अपने पेट पर हाथ फिराते मैं सोच रही थी कि अब ताउम्र हम दोनों ही संकट में एक-दूसरे का सहारा होंगे. ये मेरा दोस्‍त है, मेरा साथी. मैंने चाहा नहीं था अनब्‍याही मां होना मैं उस वक्‍त इलाहाबाद में थी. घर पर भाई की शादी का जश्‍न था. तैयारियां जोरों पर थीं. मैं बड़े-बड़े देग और कहाडि़यों में गोश्‍त और बिरयानी पकाते हुए पूरे घर में चकरघिन्‍नी की तरह घूम रही थी. शादी वाले घर में कितने काम होते हैं. घर की बड़ी लड़की के सिर सारी जिम्‍मेदारियों का बोझ था. लड़की खुशी-खुशी सब काम कर रही थी कि तभी अचानक मुझे चक्‍कर सा आया और मैं बेहोश हो गई. अफरा-तफरी मची. घरवालों को लगा कि काम की थकान होगी. डॉक्‍टर ने जांच की और बताया कि मेरे पेट में बच्‍चा है. मैं मां बनने वाली थी.शादी का घर अचानक मातम के घर में बदल गया. छोटे शहर में अगर कुंवारी लड़की पेट से हो जाए तो पूरे खानदान की इज्‍जत मिट्टी में मिल जाती है. बड़ी हाय-तौबा हुई. अम्‍मी ने आंसू बहाए, अब्‍बा बौखलाए फिरे. भाई को लगा कि बहन ने नाक कटा दी है. पूछताछ हुई. मैं उस वक्‍त एक रिश्‍ते में थी. मैं उससे प्‍यार करती थी. बच्‍चा प्‍लान नहीं किया था. वो तो बस आ गया था. वो मेरे प्‍यार की निशानी थी. उस अफरा-तफरी में बच्‍चे के बाप को तलब किया गया. वो मुंबई से आया. हमने अपने रिश्‍ते की बात स्‍वीकारी, रिश्‍ते की बात घरवालों ने भी स्‍वीकारी, ये तय हुआ कि अब ब्‍याह हो जाएगा. प्‍यार तो था ही, अब प्‍यार की निशानी भी थी और प्‍यार को दुनिया के सामने स्‍वीकार भी किया जा रहा था. खुशी का वो कैसा तो लम्‍हा था. थोड़ी देर पहले घर में जो मातम का माहौल था, वो खुशी में बदल गया. मैं खुश थी कि घर पर सबने हमें स्‍वीकार कर लिया था. शादी निपटाकर मैं मुंबई लौट आई. मेरे दरवाजे पर खड़ी थी वो औरत दो बच्‍चों के साथLoading... अभी दो-तीन दिन भी नहीं गुजरे थे कि एक दिन सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजे पर एक सकुचाई, डरी सी दर‍मियाने कद की औरत खड़ी थी अपने बच्‍चों के साथ. मैंने आश्‍चर्य से देखा कि तुम कौन हो, तुम्‍हें क्‍या चाहिए. वो दरवाजे पर खड़े-खड़े रोने लगी. मैंने उसे भीतर बुलाया और फिर जो पता चला तो मानो पैरों तले जमीन खिसक गई हो. जिस मर्द का बच्‍चा मेरे पेट में सांसें ले रहा था, ये औरत उसकी बीवी थी. वो पहले से शादीशुदा था और उसके दो बच्‍चे भी थे. ऐसा लगा, जैसे जलते हुए कोयलों पर पांव पड़ गया हो. जबान को जैसे लकवा मार गया हो. पेट ऐंठ रहा था, हाथ-पैर की उंगलियां सुन्‍न हुई जा रही थीं. उसके जाने के बाद मैं घंटों ऐसे पड़ी रही मानो शरीर में जान ही न हो. वो आदमी अब भी अपनी पहली पत्‍नी को तलाक देकर मुझसे शादी करने को तैयार था लेकिन मुझे किसी का घर तोड़कर अपना घर नहीं बसाना था. मुझे उस आदमी पर दो बातों का गुस्‍सा था. एक तो उसने मुझसे झूठ बोला, मुझे धोखा दिया. और दूसरे वो एक औरत की जिंदगी तबाह कर, उसे उसके बच्‍चों के साथ दुनिया की ठोंकरे खाने के लिए अकेला छोड़ मेरे साथ अपनी नई दुनिया बसाना चाहता था. ऐसा आदमी तो प्‍यार किए जाने के भी लायक नहीं, शादी तो बहुत दूर की बात है. मैंने शादी तोड़ दी. सबने कहा, बच्‍चा गिरा दो अब सबसे बड़ा सवाल ये था कि ये तो मेरे पेट में पल रहा है, इसका क्‍या होगा. अभी कुछ देर पहले तक ये लव चाइल्‍ड था, हमारे प्रेम की निशानी थी, और अब एक क्षण में ये नाजायज हो गया था. घरवालों ने कहा कि अबॉर्शन करवा दो. मैंने भी यही तय किया. अगले दिन हमें डॉक्‍टर के पास जाना था. उस रात जब मैं बिस्‍तर पर अकेली लेटी थी तो अपने पेट पर हाथ फिराते हुए पहली बार उसके होने को महसूस किया. मुझे लगा, अरे कल ये नहीं रहेगा. मैं इसे मारने वाली हूं. किसी के होने का एहसास तब होता है न, जब लगे कि अब वो नहीं होगा. अचानक मुझे लगा कि मैं ये ख्‍याल बर्दाश्‍त ही नहीं कर पा रही हूं. मुझे लगा कि मैं मर जाऊंगी. जो कुछ हुआ, हमने किया. इसमें इस बच्‍चे की क्‍या गलती. ये बच्‍चा क्‍यों नाजायज है. मैं अगले दिन सुबह सोकर उठी और अपना फैसला सुना दिया. मैं इस बच्‍चे को जन्‍म दूंगी. घरवालों ने कहा कि फिर लौटकर घर मत आना. मैंने तय किया, कभी नहीं जाऊंगी. उसके बाद से लेकर मेरे बेटे के जन्‍म तक का समय बहुत मुश्किलों भरा रहा. मैं बिलकुल अकेली थी. मेरे पास एक मेड तक नहीं थी, जो घर के काम या मेरी देखभाल में कोई मदद करती. मुझे किसी ने नहीं बताया कि क्‍या करो, क्‍या न करो. ऐसे मत करो, कहीं बच्‍चे को नुकसान न हो. पैरों में सूजन हुई तो किसी ने पांवों में तेल नहीं लगाया. किसी ने पेट पकड़कर ये नहीं कहा कि अरे, तेरे बच्‍चा लात मार रहा है. किसी ने सिर पर हाथ नहीं रखा. जिस दिन मनाल पैदा हुआ था, मैं खुद ही ऑटो करके हॉस्पिटल गई, अपनी डिलिवरी के कागजों पर खुद ही साइन किया, बच्‍चा पैदा किया और अकेले ही उसे घर लेकर आई. मनाल जब पेट में था, तब भी अकेला वही मेरे साथ था. जब मैंने उसे पहली बार गोद में लिया तब भी सिर्फ वही था. जब बेटे ने पूछा, क्‍या मैं एक गलती हूं आज मेरा बेटा 13 साल का है और इन 13 सालों में जिंदगी बहुत बदल चुकी है. आज मैं एक स्‍थापित फैशन डिजाइनर हूं, टीवी पर मेरे शो चल रहे हैं, फैशन डिजाइनिंग के लिए, मुझे कई अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है. 21 साल की उम्र में जब पहली बार मुंबई आई थी तो मेरी जेब में सिर्फ 3000 रु. थे. मैं काम के लिए लोगों के दरवाजे भटकी थी, आज मैं लोगों को काम देती हूं. मेरे बेटा, जो कभी दुनिया की नजर में शर्मिंदगी का सबब था, आज मेरा गर्व है और घरवाले भी उसे प्‍यार करते हैं. सफलता आपकी सारी गलतियों को ढक देती है. आप सफल हैं तो कोई नहीं पूछता कि बिनब्‍याही औरत होकर मां कैसे बनी. हालांकि दिक्‍कतें तो बाद में भी आईं. स्‍कूल में एडमिशन कराने से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक हर जगह एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी. सबको बाप का नाम चाहिए था, मैंने बाप के कॉलम में भी अपना नाम लिखा. मैं ही हूं बाप. मैं मां भी हूं, पिता भी हूं. आप एडमिशन लीजिए. सब ऐसी टेढ़ी नजरों से देखते, उल्‍टे-सीधे सवाल करते और वो भी मेरे बच्‍चे के सामने. उस दिन पासपोर्ट ऑफिस में काउंटर पर बैठी औरत ने मेरे बच्‍चे के सामने कहा कि गलती आप लोग करते हैं और भुगतना बच्‍चे को पड़ता है. मेरा बेटा बाहर निकलकर मुझसे पूछता है कि मां, क्‍या मैं गलती हूं. मैं सिखा रही हूं उसे अपने लिए लड़ना मुझे लगा कि मैं दुख से मर जाऊंगी. मैंने दो साल तक पासपोर्ट नहीं लिया. मेरी जिद थी कि जब तक वो महिला मुझसे मेरे बेटे के सामने माफी नहीं मांगती, मैं पासपोर्ट नहीं लूंगी. ये उदाहरण रखना बहुत जरूरी था. उस दिन जब बेटे ने पूछा था कि क्‍या मैं गलती हूं तो मुझे समझ नहीं आया कि क्‍या जवाब दूं, कैसे दूं. मैंने ये लड़ाई लड़ी, ये साबित करने के लिए कि बेटा, तू गलती नहीं है. तू तो मेरा प्‍यार है. ये औरत गलत है और उसे अपनी गलती की माफी मांगनी होगी. अगर आज मैं इस सच के लिए, इस मूल्‍य के लिए नहीं लडूंगी तो कल को मेरा बेटा भी उन लोगों से नहीं लड़ पाएगा, जो उस पर उंगली उठाएंगे. अगर आप अपने लिए नहीं लड़ेंगे तो भूल जाइए कि दुनिया आपके लिए लड़ेगी. मैंने अंगद की तरह अपने पांव अड़ा दिए हैं, जिसमें दम हो, हिला दे. आज बाप के बारे में कोई पूछे तो मेरा बेटा बहुत गर्व से कहता है कि मम्‍मा ही पापा है. मैं आज भी सिंगल हूं. अब मुझे मर्द की जरूरत नहीं है. मैं पूरी जिंदगी अपने लिए लड़ी ताकि मेरा बेटा अपने लिए लड़ना सीख सके. ये भी पढ़ें- Human Story: तंत्र साधना के नाम पर मर्द तांत्रिक औरतों का यौन शोषण करते थे Human Story: मर्दों के लिए मोटी लड़की मतलब हॉट बिग एसेट, लेकिन वो हॉट लड़की से शादी नहीं करते Human Story: मैं चाहता हूं कि अंकित बस एक बार सपने में आकर मुझसे बात कर ले Human Story: औरतों का डॉक्‍टर होना यानी देह के परे स्‍त्री को एक मनुष्‍य के रूप में देखना मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव- मेरा काम लोगों की जासूसी करना, उनके राज खोलना फेमिनिस्‍टों को क्‍या मालूम कि पुरुषों पर कितना अत्‍याचार होता है ? कभी मैडमों के घर में बाई थी, आज मैडम लोगों पर कॉमेडी करती है मिलिए इश्‍क की एजेंट से, जो कहती हैं आओ सेक्‍स के बारे में बात करें प्‍यार नहीं, सबको सिर्फ सेक्‍स चाहिए था, मुझे लगा फिर फ्री में क्‍यों, पैसे लेकर क्‍यों नहीं एक अंजलि गई तो उसके शरीर से पांच और अंजलियां जिंदा हो गईं मैं दिन के उजाले में ह्यूमन राइट्स लॉयर हूं और रात के अंधेरे में ड्रैग क्‍वीन 'मैं बार में नाचती थी, लेकिन मेरी मर्जी के खिलाफ कोई मर्द मुझे क्‍यों हाथ लगाता' घर पर शॉर्ट स्‍कर्ट भी पहनना मना था, अब टू पीस पहनकर बॉडी 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