प्यार की तलाश में हैं लोग! क्या शादी से उठ गया है विश्वास?

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BYBhagya Shri SinghBhagya Shri Singh | News18Hindi Updated: May 15, 2019, 1:41 PM IST
स्वतंत्रता वो भाव है, जो इंसान को सबसे ज्यादा प्रिय है. प्राचीन समय में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं अर्थात पराधीनता में सपने में भी सुख नहीं मिल सकता. स्वतंत्रता को सीधे शब्दों में समझा जाए तो इसे खुद (स्व) द्वारा बनाया गया तंत्र कहा जा सकता है यानी खुद के बनाए नियमों के मुताबिक़ जीवन जीना. आदिम समय में मनुष्य सामाजिकता के बंधन से परे एक स्वतंत्र प्राणी था, जो केवल अपनी जरूरतें पूरी करना जानता था. वो जरूरत खाने की, सामान की या शरीर की भी हो सकती थी. हिंदू धर्म में विवाह को सात जन्मों का बंधन माना गया और शुरुआत में सम्बन्ध विच्छेद की कोई अवधारणा नहीं थी. हालांकि इस्‍लाम में विवाह को एक संविदा माना गया है क्योंकि वहां शादी से पहले ही मेहर की रस्म तय हो जाती है. इसके बाद ही निकाह क़ुबूल माना जाता है. लेकिन वर्तमान में जब से साझा छत का कॉन्सेप्ट ख़त्म होता जा रहा है लोगों में स्व यानि मैं की भावना बढती जा रही है. अब लोग एक दूसरे के लिए अपनी खुशियां कुर्बान नहीं करते बल्कि वो तब तक साथ रहना पसंद करते हैं जब तक उन्हें रिश्ते से ख़ुशी मिलती है. अब लोग मरे हुए रिश्तों की लाश ढ़ोने की जगह एक दूसरे को आजाद करना पसंद करते हैं. पढ़ें: कपड़े उतारे मर्द, शर्मिंदा हों औरतें शायद यही वजह है कि भारत जैसे देश में शादी जैसे रिश्ते, जिसे कभी जन्म-जन्मान्तर का बंधन माना गया है, के प्रति युवाओं का रुझान कम होता जा रहा है. इसकी वजह लोगों में बढ़ती हुई स्व की भावना, आर्थिक आत्मनिर्भरता और विचारों का खुलापन हो सकता है. पुराने समय में ये प्रचलन था कि पुरुष घर से बाहर कमाने के लिए जाएगा और स्त्री घर संभालेगी. बहुत पहले जाएं तो समाज मातृसत्ता प्रधान था. तब बच्चों के नाम मां के सरनेम पर रखे जाते थे लेकिन इसके बाद जब महिलाओं को चारदीवारी में सीमित कर दिया गया तो पितृसत्ता समाज पर हावी हो गई. घर-परिवार की आर्थिक स्थिति और बच्चों की वैधानिकता पुरुष के दम पर तय होने लगी. लेकिन बहुत समय बाद जब स्त्रियों ने घर की देहरी लांघी तो अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक हुईं. अब स्वतन्त्रता का भाव केवल पुरुष की ही थाती नहीं रहा बल्कि स्त्री भी उसमें बराबर का हक़ जताने लगीं.पढ़ें: आंटी! उसकी टांगें तो खूबसूरत हैं, आपके पास क्‍या है दिखाने को ? लंबे समय से हावी रही पितृसत्ता को स्त्री की स्वतंत्रता बेहद नागवार लगी. आर्थिक बोझ साझा करने के लिए उसे स्त्री का कंधा मिलाकर साथ काम करना तो मंजूर है लेकिन घर पर वो उसे एक परंपरावादी स्त्री के रूप में किचन में खाना बनाते हुए देखना चाहता है. स्त्रियों को लगता है कि अगर जीवनसाथी और वो दोनों ही कमा रहे हैं तो घर की जिम्मेदारी का भार केवल उसके सिर ही क्यों हो? बच्चों की परवरिश केवल वही क्यों करे? जब महिलाएं किसी भी लिहाज से पुरुषों से कम नहीं हैं तो आखिर अधिकारों की बात आने पर समझौते की उम्मीद उन्हीं से क्यों की जाए? पढ़ें:  रिश्ते में साथी को स्पेस देने से बढ़ता है प्यार, जानिए प्रिवेसी के मायने?ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती. ये एक मुहावरा है जो वर्तमान समय में भी पूरी तरह प्रासंगिक है. स्त्रियां जब तक घर की चारदीवारी में चुप थीं, तब तक साझा घर सुरक्षित थे. लेकिन जब स्त्रियों ने अपने अधिकार चाहे तो रिश्तों में दरारें आने लगीं. लम्बे समय से समाज को हंटर से हांकने वाली पितृसत्ता के कान खड़े हो गए कि एक स्त्री कैसे अपने अधिकार मांग सकती है. भारतीय समाज में पितृसत्ता ने स्त्रियों की पहचान मां, पत्नी, बेटी और बहन जैसे रिश्तों में बांध दी थी और जो इन रिश्तों में नहीं बंधीं, उन्हें वेश्या करार दे दिया गया. मान लिया गया कि शारीरिक जरूरतों से स्त्री का कोई लेना देना ही नहीं है. बस वो दूसरों की इच्छाएं पूरी करने के लिए बनी हैं. एक बार तलाक के एक मामले में फैसला सुनाते हुए एक जज ने कहा था कि अगर किसी फूल में कांटे ही कांटे है तो उसे रखने से अच्छा है, तोड़ दो. सच ही तो है, मर जाने से बेहतर है, जिंदगी चुनो. अगर किसी के साथ ख़ुशी नहीं मिलती तो उसे आजाद छोड़ दो और खुद भी मुक्त हो जाओ. लेकिन समाज में रहते हुए आजादी हासिल करना मर्द के लिए तो आसान हो सकता है, लेकिन महिला के सिर पर एक बार फिर घर, खानदान की इज्जत का बोझ, लोग क्या कहेंगे, बिना शादी के जिंदगी कैसे कटेगी जैसे सवाल आते हैं. लेकिन अब जब औरतों ने अपने अधिकार समझे तो न केवल संपत्ति पर मालिकाना हक़ जताया बल्कि शारीरिक जरूरतों को लेकर भी मुखर हुईं. अब वो अनुगामिनी नहीं बल्कि जिंदगी के हर पहलू में लीड रोल में हैं. चाहे वो सिंगल मदर के रूप में हो, प्रेमिका के रूप में हो या पत्नी के रूप में. अब अपने वजूद को पूरा करने के लिए उसे एक मर्द की दरकार नहीं है. आज की औरत जानती है कि अगर वो कमा सकती है तो रहने और खाने का जुगाड़ भी कर सकती है. फिर क्यों शादी के नाम पर किसी के सामने झुकना या समझौते करना. पार्टनर अगर बराबरी का हो तो ठीक नहीं तो गुडबाय कहने में देर नहीं लगाती आज की औरत. समाज के बनाए नियमों के मुताबिक़ लड़की सुन्दर होनी चाहिए और लड़का ज्यादा पैसे कमाने वाला. अगर लड़की रंग-रूप को लेकर कुछ कहे तो उसे तमाम उलाहने दिए जाते हैं अच्छा कमाता है लड़का, खुश रहोगी तुम. बिना लड़की से ये पूछे कि आखिर उसकी ख़ुशी कहां है, किसके साथ है. बिना लड़की के मन की बात जाने घरवाले भावी जीवनसाथी के रूप में उसे एक चमचमाता प्रोडक्ट दिखाते हैं और सोचते हैं कि यही लड़की के लिए ठीक है. पहले के समय में लड़कियां समाज और माता पिता के दबाव में शादी के लिए हां कह देती थीं और आखिरी सांस तक लाश की तरह एक मरे हुए रिश्ते को घसीटती थीं. लेकिन अब नरेटिव बदल रहा है. वर्तमान में शादी के बंधन से ज़्यादातर लोगों का विश्वास उठता जा रहा है. अब लोग शादी से ज्यादा डेटिंग करना पसंद कर रहे हैं. इसे सीधे शब्दों इस तरह समझ सकते हैं कि लोग कुछ समय साथ बिताते हैं ताकि एक दूसरे के बारे में गहराई से पता चल सके, साथी के साथ इमोशनल बांड बन सके. अगर ऐसा हुआ तो बात शादी तक भी पहुंच सकती है. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो भी आज का युवा वर्ग दिल पर बोझ नहीं रखता है. एक पल में वर्तमान पार्टनर एक्स बन जाता है और बंदा आसानी से मूव ऑन कहकर अगले की तलाश में आगे बढ़ जाता है. जब से डेटिंग ऐप्स आईं हैं, समाज में ऐसी चीजों की बाढ़ आ गई है. यही वजह है कि अब लोग मैट्रीमोनियल साइट्स पर जीवनसाथी से ज्यादा डेटिंग साइट्स पर अपने जैसे ही किसी साथी को तलाश रहे हैं. गूगल की 'ईयर इन सर्च-इंडिया : इनसाइट्स फॉर ब्रैंड्स' की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि डेटिंग साइट्स पर पहले की अपेक्षा पार्टनर खोजना 40 प्रतिशत बढ़ा है. वहीं मैट्रीमोनियल साइट्स पर जीवनसाथी की तलाश में केवल 13 फीसदी की ही बढ़त हुई है. रिपोर्ट से साफ है कि लोगों के लिए अब प्यार और भावनाएं ज्यादा प्रमुख हैं. कॉर्पोरेट कल्चर और 9 घंटे ऑफिस में बिताने वाला युवा वर्ग अब अपनी मर्जी से जीवन जीना चाहता है. 9 घंटे की शिफ्ट के बाद बची जिंदगी वो अपने मन के साथी के साथ बिताना चाहता हैं. ताकि जब वो उसके कंधे पर सिर रखकर दिल का गुबार निकाले तो उसे एक पल के लिए भी दोबारा सोचना न पड़े कि अगला साथी उसके बारे में कुछ गलत सोच सकता है. देखा जाए तो ये भले ही मॉडर्न ट्रेंड हैं लेकिन एक बार फिर लोग पुराने वक्त की तरफ लौट रहे हैं. जब रिश्तों में बंधें बिना भी एक-दूसरे से प्यार होता था. जरूरत में लोग एक दूसरे के साथ होते थे. सोचने वाली बात है कि जिस रिश्ते का आधार प्रेम न हो उसके होने का क्या मतलब. किसी ने सही ही कहा है कि प्रेम आजादी का ही नाम है. आजादी जिसमें खुद को पा लेने का एहसास हो, जिसमें प्रेम की अपेक्षाओं, अनचाहे शारीरिक सम्बन्ध और रोज खाना पकाने का बंधन न हो. बस हम जैसे हैं अगला हमारी हकीकत को जानते हुए हमें वैसे ही स्वीकार कर लें. पढ़ें: जीने के लिए कितना पैसा चाहिए? वो याद आज भी जेहन में एकदम ताजा है जब एक बार इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में स्त्री विमर्श पर आमंत्रित मुख्य गेस्ट सुभाषिनी अली ने कहा था कि शादी हमेशा अपनी मर्जी से करनी चाहिए. अगर शादी में किसी एक की भी मर्जी नहीं है तो ये एक तरीके से बलात्कार ही हुआ न. मैंने बहुत ध्यान से उनकी बात सुनी और आत्मसात कर ली. घर पर जब रिश्ते की बात चली तो बिना सोचे समझे ऐलान किया कि हम लड़के को समझने के बाद ही शादी कर पाएंगे. बिना समझे किसी से शादी करना बलात्कार है. इसके बाद तो पिताजी फायर हुए. मां से बोले-समझाओ अपनी बेटी को. बिना कुछ सोचे अंट-शंट बोलती रहती है. मां ने कोशिश की समझाने की. लेकिन इस बात का जवाब उनके पास भी नहीं था कि बिना किसी से प्रेम के शादी क्यों करूं. पिताजी ने समझाया कि भारतीय कानून में वैवाहिक बलात्कार जैसा कोई शब्द नहीं है. मैंने भी गूगल पर खंगाला तो यही जानकारी मिली कि ऐसा कोई टर्म हिन्दू विवाह अधिनियम में नहीं है. मेरे ख्याल से शादी की दहलीज पर खड़ी हर लड़की के दिल में यही सवाल कुलबुलाता होगा. शायद यही वजह है कि आज का युवा वर्ग शादी से ज्यादा डेटिंग को तरजीह दे रहा है. लाइफस्टाइल, खानपान, रिश्ते और धर्म से जुड़ी खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स