भारत में बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम, ये है वजह

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BYNews18Hindi Updated: July 11, 2019, 10:17 PM IST
ब्रिटिश और ईरानी नौसैनिक पोतों के बीच गुरुवार को होर्मुज जलसंधि में हल्का गतिरोध देखने को मिला है. इसके बाद से ही फारस की खाड़ी में बढ़ती तनातनी ने पूरी दुनिया में ऊर्जा की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं. ब्रिटिश नौसेना का कहना है कि उसने ईरानियों के ब्रिटिश तेल टैंकरों के रास्ते में बाधा डालने के प्रयासों को नाकाम कर दिया है. ऐसा ईरान के अपने सुपरटैंकर के जिब्राल्टर में पकड़े जाने के बाद हुआ है. इस दौरान ईरान ने यूरोपीय देशों से इसके परिणाम भुगतने की बात कही थी. सीरिया में ईरानी तेल टैंकरों पर लगे यूरोपियन प्रतिबंधों को तोड़ने के चलते पकड़ा गया था. दुनिया के कुल तेल टैंकरों का पांचवा भाग इसी होर्मुज जलसंधि से होकर गुजरता है. ऐसे में इस इलाके में छिड़ने वाला कोई भी युद्ध कच्चे तेल की सप्लाई को बुरी तरह से बाधित करेगा. इससे सबसे ज्यादा नुकसान बहुत ज्यादा तेल आयात करने वाले एशिया को होगा. हम आपको बता रहे हैं कि क्यों यह जलमार्ग भारत के लिए भी काफी मायने रखता है- होर्मुज जलसंधि कहां है?फारस की खाड़ी में एक पतला सा हिस्सा होर्मुज जलसंधि है. यह ईरान और ओमान के बीच से होकर जाता है. इस जलसंधि का सबसे पतला भाग 33 किमी का है. इस जलसंधि में पोतों के आने और जाने का रास्ता मात्र 3-3 किमी चौड़ा है.
फारस की खाड़ी में एक पतला सा हिस्सा होर्मुज जलसंधि है (सैटेलाइट तस्वीर)
क्यों मायने रखती है यह जलसंधि?पूरी दुनिया में होने वाले कुल कच्चे तेल के व्यापार का 20% इसी जलसंधि से होता है. इस रास्ते से रोज करीब 18.5 मिलियन बैरल कच्चे तेल को रोज दूसरे देशों में भेजा जाता है. यहां से जाने वाला तेल ओपेक देशों में शामिल बड़े तेल उत्पादक सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात और कुवैत हैं. इस जलसंधि से भेजे जाने वाले तेल में से 80% तेल एशिया के तेजी से तरक्की करते देशों जैसे चीन, जापान, भारत और दक्षिण कोरिया को सप्लाई होता है. दुनिया भर में प्रयोग की जाने वाली लिक्विफाइड नेचुरल गैस का एक तिहाई हिस्सा भी इसी जलसंधि से सप्लाई किया जाता है. ऐसे में अगर इस पतले से हिस्से में किसी भी तरह का युद्ध छिड़ता है तो दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं को इससे भारी नुकसान पहुंचेगा. ऐसा कुछ होने से कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ेंगे और इससे आमतौर पर तेल और गैस के दामों पर बड़ा असर होगा. अब क्या होने के आसार हैं? गुरुवार को अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े गतिरोध के बीच यह ख़बर आई है. 2015 की परमाणु संधि को पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने रद्द कर दिया था और ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए थे. इसके बाद ईरान की अर्थव्यवस्था बहुत खराब हालत में चली गई थी. अमेरिका और ईरान इस बीच एक-दूसरे को अपनी ताकत का एहसास करने के लिए बहुत से प्रयास कर चुके हैं. फिलहाल अमेरिका ने अपने एक पोत, हमलावर और फाइटर जेट इलाके में किसी भी ईरानी संकट से निपटने के लिए भेज रखे हैं. वहीं ईरान ने एक मानवरहित अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच गतिरोध काफी बढ़ गया था. अमेरिका ने ईरान को अपने टैंकों पर हुए रहस्यमयी हमलों के पीछे होने का आरोप भी लगाया था. गुरुवार को जो हुआ वह ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की सेना के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी हो सकता है. लेकिन ईरानी सेना ने ऐसे किसी भी नौसैनिक पोत को रोकने के प्रयास से इंकार किया है. लेकिन यह तय है कि अगर दोनों के बीच इस क्षेत्र में और ज्यादा गतिरोध होता है तो भारत सहित अन्य एशियाई देशों को इसका आर्थिक नुकसान भुगतना होगा. यह भी पढ़ें: क्यों ईरान के हौसले हैं बुलंद? कितनी है ईरान की सैन्य ताकत?